शिक्षा

राज्य में एक ऐसा भी गांव जहॉ नौनिहाल आज भी पेड़ की छांव में बैठ कर पढ़ते हैं …..शासन प्रशासन के सारे दावे फेल …..हकीकत ये …

By: हरिमोहन तिवारी
2019-03-09 07:55:15 PM
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राज्य में एक ऐसा भी गांव जहॉ नौनिहाल आज भी पेड़ की छांव में बैठ कर पढ़ते हैं …..शासन प्रशासन के सारे दावे फेल …..हकीकत ये …


पेड़ के निचे पढ़ने मजबूर नौनिहाल, प्रशासन की उदासीनता फिर आई सामने. सरकार के दावे और वायदे की पोल खोलती

धरमजयगढ़ क्षेत्र के बीजापतरा प्राथमिक स्कूल जहाँ के बच्चे महीने या एकात साल नहीं बल्कि पुरे 8 सालों से खुले में पेड़ के निचे बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं ।

बच्चों की ये दयनीय स्थिति पुरे 8 सालों से जस की तस बनी हुई है जिसकी वजह ये है की यहाँ का प्राथमिक शाळा भवन पूरी तरह से जर्जर हो गया है.चारो तरफ से डैमेज है स्कूल की छत और दरो दीवार गिर रहे है, इसलिए शिक्षक सुरक्षा की दृष्ठि से मजबूरीवश बच्चों को खुले आसमान के निचे पेड़ की छाँव में पढ़ाने को मजबूर हैं ।

ऐसी बात नहीं की इस गंभीर मामले से उच्चाधिकारी अवगत नहीं है उनके संज्ञान में ये बात है,की 8 सालों से छत की आस लगाए बैठे है शिक्षक और स्कूली बच्चे,आखिर न जाने कब स्थानीय प्रशासन की नींद टूटेगी कब मिलेगा बच्चों को पढ़ने के लिए सिर पे छत.ये बड़ा सवाल है ?


 मामला धरमजयगढ़ विकासखंड अंतर्गत बिजापतरा गाँव का है जहाँ प्राथमिक शाळा के नन्हे स्कूली बच्चे पेड़ के निचे बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं. पहेली और दूसरी क्लास के बच्चे तो भवन के अभाव में किचन शेड में ही जैसे तैसे पढ़ाई कर रहे तो वहीँ तीसरी, चौथी और पांचवी के बच्चे खुले में पेड़ के निचे गर्मी, धुप, पानी, बरसात को झेलकर पढ़ाई कर रहे हैं.बड़ी विडम्बना है आज के इस दौर में बच्चों के पढ़ने के लिए सिर पे छत तक नहीं है और सरकार है की विकास की ढोल पीट रही है.ऐसे में सरकार के सारे नारे और वायदे धरे के धरे नज़र आते है  कैसे पढ़ेगा देश ,कैसे बढ़ेगा देश।


*जर्जर हो चुका स्कूल*
स्कूल शिक्षकों की माने तो बच्चों के लिए अतिरिक्त भवन निर्माण के लिए प्रस्ताव दिए सालों हो गए.भवनविहीन स्कूल की गंभीर समस्याओं से उच्चधिकारियों को अवगत करा चुके लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं अधिकारी कहते है हो जाएगा बहुत जल्द भवन बन जाएगा लेकिन केवल आश्वासन ही मिल रहा है, स्कूल को भवन नहीं मिल पा रहा है.नतीजन नौनिहाल खुले में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं कुलमिलाकर मासूम बच्चों का भविष्य खतरे में है ।



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